प्रयागराज (24 जनवरी 25)। 90 के दशक की मशहूर बॉलीवुड अभिनेत्री ममता कुलकर्णी ने अब फिल्म इंडस्ट्री से दूर होकर वैराग्य की राह पकड़ ली है। वे अब किन्नर अखाड़े से जुड़ गई हैं और संन्यास की ओर बढ़ते हुए किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर बनने जा रही हैं। ममता ने अपना पिंडदान कर दिया है और अब वे अपना जीवन वैरागी के रूप में बिताने की तैयारी कर रही हैं। उनकी दीक्षा प्रक्रिया की शुरुआत हो चुकी है और आज उनका पट्टाभिषेक समारोह आयोजित किया जाएगा, जिसके बाद वे पूरी तरह से महामंडलेश्वर बन जाएंगी।
ममता कुलकर्णी को दीक्षा के बाद अब नया नाम प्राप्त हुआ है - श्री यामाई ममता नंद गिरि। यह दीक्षा किन्नर अखाड़े की अध्यक्ष और जूना अखाड़े की आचार्य लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी द्वारा दी गई है। उल्लेखनीय है कि किन्नर अखाड़े को अब तक मान्यता नहीं मिली है, लेकिन फिलहाल यह जूना अखाड़े से जुड़ा हुआ है। महामंडलेश्वर बनने की प्रक्रिया अत्यधिक कठोर होती है। इस प्रक्रिया के तहत व्यक्ति को पहले गुरु के मार्गदर्शन में अध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करनी होती है। इसके बाद व्यक्ति को समय और तपस्या के द्वारा संन्यास के लिए तैयार किया जाता है। एक बार गुरु को यह महसूस हो जाए कि शिष्य संन्यास लेने के योग्य है, तब उसे महामंडलेश्वर की दीक्षा दी जाती है। इसके बाद शिष्य को पूरी तरह से परिवार और मोह से मुक्त कर दिया जाता है। महामंडलेश्वर बनने से पहले व्यक्ति का वेरिफिकेशन भी किया जाता है। आवेदन के बाद अखाड़ा परिषद उस व्यक्ति के बारे में पूरी जानकारी एकत्र करता है, जिसमें उसके परिवार, गांव, और क्रिमिनल बैकग्राउंड का भी सत्यापन किया जाता है। यदि कोई जानकारी गलत पाई जाती है तो दीक्षा देने से इनकार कर दिया जाता है।
महामंडलेश्वर बनने के लिए पहले अखाड़े में आवेदन किया जाता है। फिर दीक्षा के दौरान व्यक्ति का तर्पण, मुंडन और स्नान किया जाता है। इसके बाद परिवार का पिंडदान कर विजय हवन संस्कार किया जाता है। गुरु दीक्षा देने के बाद शिष्य की चोटी काटी जाती है और फिर पट्टाभिषेक किया जाता है। इसके बाद शिष्य को चादर भेंट की जाती है और उसका समाज में सम्मान बढ़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में शिष्य को अपना जीवन साधना और समाज सेवा के लिए समर्पित करना होता है, जिसमें वह आश्रम, संस्कृत विद्यालय और ब्राह्मणों को वेद की शिक्षा भी प्रदान करता है।