नईदिल्ली (30 जनवरी 26)। सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए बनाए गए UGC के नए नियमों (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि इन नियमों में सुधार नहीं किया गया, तो इसके परिणाम समाज के लिए विनाशकारी और विभाजनकारी हो सकते हैं।
विभाजन का खतरा- कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि इन नियमों में हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो यह समाज को बांटने का काम करेंगे। इसके खतरनाक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अस्पष्ट भाषा: पीठ ने कहा कि शुरूआती भाषा अस्पष्ट और भ्रमित करने वाली है। विशेषज्ञों को इसकी भाषा फिर से जांचने की जरूरत है ताकि इसका दुरुपयोग न हो सके।
क्षेत्रीय भेदभाव पर सवाल: CJI ने एक उदाहरण देते हुए पूछा कि यदि उत्तर भारत का कोई छात्र दक्षिण में या दक्षिण का छात्र उत्तर में पढ़ाई करता है और उसे वहां क्षेत्रीय या भाषाई अपमान सहना पड़ता है, तो इन नियमों में उसके लिए क्या समाधान है?
75 वर्षों की उपलब्धियां दांव पर: मुख्य न्यायाधीश ने भावुक होते हुए कहा, 'हमने 75 सालों में जिस वर्गहीन समाज का सपना देखा, क्या ये नियम हमें वहां से पीछे नहीं ले जा रहे?' उन्होंने अंतरजातीय विवाहों और मिश्रित छात्रावासों का हवाला देते हुए समावेशिता पर जोर दिया।
रैगिंग और संस्कृति: कोर्ट ने टिप्पणी की कि रैगिंग के दौरान अक्सर उत्तर-पूर्व या अन्य राज्यों के बच्चों की संस्कृति पर टिप्पणी की जाती है। नियमों को इन वास्तविकताओं को भी समझना चाहिए।
अदालत ने फिलहाल 2026 के नियमों पर रोक लगाते हुए स्पष्ट किया है कि तब तक 2012 के पुराने नियम प्रभावी रहेंगे। केंद्र सरकार को इस पर अपना पक्ष रखने का समय दिया गया है और मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी।