बेंगलुरु (06 अक्टूबर 26)। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार अपनी सरकार की जनता-केंद्रित शासन की कोशिशों को एक राजनीतिक पहचान देने की कोशिश कर रहे हैं और इसी के तहत वह लोगों से अपील कर रहे हैं कि उन्हें‘राज्य का शासक'कहने की बजाय ‘जनता का सेवक' कहकर बुलायें। उल्लेखनीय है कि उनकी यह अपील सिर्फ इस बारे में नहीं है कि मुख्यमंत्री को किस नाम से बुलाया जाए। यह ऐसे समय में आई है जब शिवकुमार की सरकार ‘जनता का सेवक' को एक खास प्रशासनिक पहल के तौर पर विकसित करना चाहती है, जिसका मकसद सरकारी सेवाओं और शिकायतों के समाधान को सीधे नागरिकों तक पहुंचाना है।
शिवकुमार ने कहा है, 'मैं राज्य का शासक नहीं हूं। मैं जनता का सेवक हूं। अब से अगर आप मुझे ‘जनता का सेवक' कहकर बुलाएंगे, तो इससे बड़ी खुशी मेरे लिए और कोई नहीं होगी।' उन्होंने लोगों और नेताओं से सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनका परिचय देते समय इसी शब्द का इस्तेमाल करने का आग्रह किया है। शिवकुमार ने कर्नाटक के राजनीतिक इतिहास में अपनी छाप छोड़ने की बात कही है और‘जनता का सेवक'पहल उन्हें अपने कार्यकाल के साथ शासन की एक अलग पहचान जोड़ने का मौका देती है। इसकी अवधारणा बहुत सीधी है-किसी सरकारी सेवा को पाने या अपनी शिकायत का समाधान कराने के लिए नागरिक को एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय के चक्कर नहीं काटने चाहिए। ‘जनता का सेवक'को एक ‘सिंगल-विंडो' प्रणाली के तौर पर पेश किया जा रहा है, जो अलग-अलग सरकारी विभागों और सेवाओं को एक ही छत के नीचे लाता है। अलग-अलग प्रमाण-पत्र और सेवाओं के लिए तालुक कार्यालय, अस्पताल, राजस्व अधिकारी या किसी दूसरे विभाग के पास अलग-अलग जाने की बजाय नागरिकों के लिए पहुंच का एक ही जरिया होने की उम्मीद है। यह पहल पहले से चल रहे ‘सकाला' प्रणाली (नागरिक सेवा गारंटी प्रणाली) को और बेहतर बनाने की कोशिश है, जिसके तहत नागरिकों को तय समय-सीमा के भीतर खास सरकारी सेवाएं पाने का अधिकार है।