Monday, 28 Sep 2026

भारतीय सोलर मिशन ने खोजे सूरज के रहस्य

बेंगलुरु (15 अगस्त 26)। वैज्ञानिकों को हमेशा से परेशान करने वाले सबसे पुराने रहस्यों में से एक यह है कि सूरज का बाहरी वायुमंडल (कोरोना) उसकी सतह से लाखों डिग्री ज्यादा गर्म कैसे है। और बार-बार होने वाले विस्फोटों के दौरान भारी मात्रा में ऊर्जा खोने के बावजूद कोरोना इतना गर्म कैसे बना रहता है?  भारत के एस्ट्रोफिजिसिस्ट का कहना है कि देश के पहले सोलर ऑब्जर्वेशन मिशन, आदित्य-L1 से मिली नई जानकारियों ने उन्हें इन रहस्यों को सुलझाने के लिए कुछ अहम सुराग दिए हैं। उनकी खोजें प्रतिष्ठित 'एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स' में छपे एक हालिया पेपर में बताई गई हैं। 

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (IIA) के प्रमुख भारतीय सोलर एस्ट्रोफिजिस्ट प्रो. आर. रमेश, जिन्होंने इस स्टडी का नेतृत्व किया, का कहना है कि सूरज के अलग-अलग हिस्सों में तापमान का अंतर फिजिक्स के नियमों को चुनौती देता है। अगर आप सूरज की परतों को काटें, तो सबसे अंदर कोर होता है जहां तापमान 15 मिलियन डिग्री सेल्सियस होता है। बाहर की तरफ सतह या फोटोस्फीयर (वह हिस्सा जो हमें पृथ्वी से दिखता है) तक जाने पर तापमान लगभग 5,500 डिग्री सेल्सियस होता है। कोर से बहुत दूर सूरज की सबसे बाहरी परत या कोरोना होती है, जहां तापमान लगभग 2 मिलियन डिग्री सेल्सियस होता है जो कभी-कभी यह 40 मिलियन डिग्री सेल्सियस तक भी जा सकता है। प्रो. रमेश कहते हैं कि कोरोना ही वह जगह है जहां सोलर फ्लेयर्स और कोरोनल मास इजेक्शन (CMEs) जैसी भयंकर घटनाएं होती हैं, जिनके दौरान सूरज से भारी मात्रा में ऊर्जा अंतरिक्ष में निकलती है। CMEs से खूबसूरत 'ऑरोरा' बनते हैं, और वे जियोमैग्नेटिक तूफान पैदा करके पृथ्वी पर जीवन को भी प्रभावित कर सकते हैं जिससे पावर ग्रिड ठप हो सकते हैं और मौसम व कम्युनिकेशन सैटेलाइट पर असर पड़ सकता है।

सामान्य या कम गतिविधि वाले समय में सूरज हर दिन दो से तीन CME छोड़ता है। अधिकतम सोलर गतिविधि चक्र के दौरान (जो हर 11 साल में आता है) एक ही दिन में 10 या उससे ज्यादा CME हो सकते हैं। प्रो. रमेश कहते हैं, 'अब अगर सूरज हर CME के ​​साथ इतनी भारी मात्रा में ऊर्जा खो रहा है और वह वापस नहीं मिल रही है, तो हमारे सौर मंडल के केंद्र में मौजूद यह तारा अपनी सारी ऊर्जा खो देगा और पृथ्वी हमेशा के लिए गहरी ठंड की चपेट में आ जाएगी।' चूंकि ऐसा नहीं हो रहा है, इसका मतलब है कि कोई "मैकेनिज्म" है जिससे कोरोना अपना इतना ज्यादा तापमान बनाए रखने में कामयाब रहता है। वैज्ञानिक इसके लिए दो वजहें बताते हैं जिसमें पहली, सूरज की सतह पर उबलने जैसी हलचल से लगातार लहरें बनती हैं। ये लहरें बाहर की ओर बढ़ते हुए कोरोना तक ऊर्जा पहुंचाती हैं- ठीक वैसे ही जैसे समुद्र की लहरें झाग और बुलबुले को किनारे तक ले जाती हैं।

दूसरी वजह है सूरज के वायुमंडल में 'उलझी हुई मैग्नेटिक फील्ड लाइनें' (चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं), जो लगातार टूटती और फिर जुड़ती रहती हैं। प्रोफ़ेसर रमेश कहते हैं कि CME तब होता है जब ये मुड़ी-तुड़ी और लूप बनाती लाइने- जो गुंथे हुए बालों जैसी दिखती हैं - टूटती हैं और अंतरिक्ष में मैग्नेटाइज्ड  प्लाज्मा और गैस के विशाल बादल छोड़ती हैं। ये अक्सर सनस्पॉट के पास बनती हैं; ये सूरज पर गहरे रंग के ठंडे हिस्से होते हैं जहां मैग्नेटिक फील्ड बहुत मजबूत होती है। वे आगे कहते हैं, 'लेकिन फिर ये लाइनें दोबारा जुड़ जाती हैं और सूरज कुछ ही घंटों में खोई हुई ऊर्जा को फिर से हासिल कर लेता है।'

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